Tuesday, 22 November 2011

कबीर के दोहे | Kabir Ke Dohe | Hindi Dohe

चाह मिटी, चिंता मिटी मनवा बेपरवाह ।
जिसको कुछ नहीं चाहिए वह शहनशाह॥

माटी कहे कुम्हार से, तु क्या रौंदे मोय ।
एक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंदूगी तोय ॥

माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर ।
कर का मन का डार दे, मन का मनका फेर ॥

तिनका कबहुँ ना निंदये, जो पाँव तले होय ।
कबहुँ उड़ आँखो पड़े, पीर घानेरी होय ॥

गुरु गोविंद दोनों खड़े, काके लागूं पाँय ।
बलिहारी गुरु आपनो, गोविंद दियो मिलाय ॥

सुख मे सुमिरन ना किया, दु:ख में करते याद ।
कह कबीर ता दास की, कौन सुने फरियाद ॥

साईं इतना दीजिये, जा मे कुटुम समाय ।
मैं भी भूखा न रहूँ, साधु ना भूखा जाय ॥

धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय ।
माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय ॥

कबीरा ते नर अँध है, गुरु को कहते और ।
हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठे नहीं ठौर ॥

माया मरी न मन मरा, मर-मर गए शरीर ।
आशा तृष्णा न मरी, कह गए दास कबीर ॥

रात गंवाई सोय के, दिवस गंवाया खाय ।
हीरा जन्म अमोल था, कोड़ी बदले जाय ॥

दुःख में सुमिरन सब करे सुख में करै न कोय।
जो सुख में सुमिरन करे दुःख काहे को होय ॥

बडा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर।
पंथी को छाया नही फल लागे अति दूर ॥

साधु ऐसा चाहिए जैसा सूप सुभाय।
सार-सार को गहि रहै थोथा देई उडाय॥

साँई इतना दीजिए जामें कुटुंब समाय ।
मैं भी भूखा ना रहूँ साधु न भुखा जाय॥

जो तोको काँटा बुवै ताहि बोव तू फूल।
तोहि फूल को फूल है वाको है तिरसुल॥

उठा बगुला प्रेम का तिनका चढ़ा अकास।
तिनका तिनके से मिला तिन का तिन के पास॥

सात समंदर की मसि करौं लेखनि सब बनराइ।
धरती सब कागद करौं हरि गुण लिखा न जाइ॥

साधू गाँठ न बाँधई उदर समाता लेय।
आगे पाछे हरी खड़े जब माँगे तब देय॥
केवल सौ दिन को सिंहासन मेरे हाथों में दे दो,

काला धन वापस न आये तो मुझको फाँसी दे दो ||

जब कोयल की डोली गिद्धों के घर में आ जाती है,
...
तो बगला भगतो की टोली हंसों को खा जाती है ||

जब-जब जय चंदो का अभिनन्दन होने लगता है,

तब-तब सापों के बंधन में चन्दन रोने लगता है ||

जब फूलों को तितली भी हत्यारी लगने लगती है,

तो माँ की अर्थी बेटों को भारी लगने लगती है ||

जब जुगनू के घर सूरज के घोड़े सोने लगते है,

तो केवल चुल्लू भर पानी सागर होने लगते है ||

सिंहो को म्याऊँ कह दे क्या ये ताकत बिल्ली में है,

बिल्ली में क्या ताकत होती कायरता दिल्ली में है ||

कहते है कि सच बोलो तो प्राण गवाने पड़ते है,

मैं भी सच्चाई को गाकर शीश कटाने आया हूँ,

घायल भारत माता की तस्वीर दिखाने लाया हूँ ||

कोई साधू सन्यासी पर तलवारे लटकाता है,

काले धन की केवल चर्चा पर भी आँख चढ़ाता है ||

कोई हिमालय ताजमहल का सौदा करने लगता है,

कोई यमुना गंगा अपने घर में भरने लगता है ||

कोई तिरंगे झंडे को फाड़े फूके आज़ादी है,

कोई गाँधी को भी गाली देने का अपराधी है ||
 
 
मोहित गंगवार... 
जिस देश में बचपन भूखा है
जहाँ रोज जवानी बिकती है
जहाँ भीख बुढ़ापा मांगे है
यह कैसा हिंदोस्तान हो गया?

जहाँ भाषा की तकरारें हैं
जहाँ मज़हब की दीवारें हैं
जहाँ खुले फिरें हत्यारे हैं,
यह कैसा हिंदोस्तान हो गया?

मैं हिंदू हूँ, मैं मुस्लिम हूँ
मैं सिख औ' ईसाई हूँ
जहाँ इक भी बचा इनसान नहीं
यह कैसा हिंदोस्तान हो गया?

मैं पंजाबी, मैं गुजराती
बंगाली और मराठी हूँ
जहाँ इक भी नहीं है भारती
यह कैसा हिंदोस्तान हो गया?

जहाँ गुंडा राज चलाता है
दिन आये हमें डराता है
कर अधम-कर्म इतराता है
यह कैसा हिंदोस्तान हो गया?

यहाँ जोड़-तोड़ के नेता हैं
दुनिया भर के अभिनेता हैं
कुछ क्रेता, कुछ विक्रेता हैं
यह कैसा हिंदोस्तान हो गया?

जहाँ राष्ट्रवाद का घाटा है
जहाँ नेता कद का नाटा है
हिंदी को मारे चाँटा है
यह कैसा हिंदोस्तान हो गया?
 
 
मोहित गंगवार... 
अनुशासनहीनता और भ्रष्टाचार

बिना टिकट के ट्रेन में चले पुत्र बलवीर
जहाँ ‘मूड’ आया वहीं, खींच लई ज़ंजीर
खींच लई ज़ंजीर, बने गुंडों के नक्कू
पकड़ें टी. टी. गार्ड, उन्हें दिखलाते चक्कू
गुंडागर्दी, भ्रष्टाचार बढ़ा दिन-दूना
प्रजातंत्र की स्वतंत्रता का देख नमूना



भ्रष्टाचार

राशन की दुकान पर, देख भयंकर भीर
‘क्यू’ में धक्का मारकर, पहुँच गये बलवीर
पहुँच गये बलवीर, ले लिया नंबर पहिला
खड़े रह गये निर्बल, बूढ़े, बच्चे, महिला
कहँ ‘काका' कवि, करके बंद धरम का काँटा
लाला बोले - भागो, खत्म हो गया आटा



घूस माहात्म्य

कभी घूस खाई नहीं, किया न भ्रष्टाचार
ऐसे भोंदू जीव को बार-बार धिक्कार
बार-बार धिक्कार, व्यर्थ है वह व्यापारी
माल तोलते समय न जिसने डंडी मारी
कहँ 'काका', क्या नाम पायेगा ऐसा बंदा
जिसने किसी संस्था का, न पचाया चंदा.
 
मोहित गंगवार... 
यमराज का इस्तीफा -अमित कुमार सिंह
एक दिन
यमदेव ने दे दिया
अपना इस्तीफा।
मच गया हाहाकार
बिगड़ गया सब
संतुलन,
करने के लिए
स्थिति का आकलन,
इन्द्र देव ने देवताओं
की आपात सभा
बुलाई
और फिर यमराज
को कॉल लगाई।

'डायल किया गया
नंबर कृपया जाँच लें'
कि आवाज तब सुनाई।

नये-नये ऑफ़र
देखकर नम्बर बदलने की
यमराज की इस आदत पर
इन्द्रदेव को खुन्दक आई,

पर मामले की नाजुकता
को देखकर,
मन की बात उन्होने
मन में ही दबाई।
किसी तरह यमराज
का नया नंबर मिला,
फिर से फोन

लगाया गया तो
'तुझसे है मेरा नाता
पुराना कोई' का
मोबाईल ने
कॉलर टयून सुनाया।

सुन-सुन कर ये
सब बोर हो गये
ऐसा लगा शायद
यमराज जी सो गये।

तहकीकात करने पर
पता लगा,
यमदेव पृथ्वीलोक
में रोमिंग पे हैं,
शायद इसलिए,
नहीं दे रहे हैं
हमारी कॉल पे ध्यान,
क्योंकि बिल भरने
में निकल जाती है
उनकी भी जान।

अन्त में किसी
तरह यमराज
हुये इन्द्र के दरबार
में पेश,
इन्द्रदेव ने तब
पूछा-यम
क्या है ये
इस्तीफे का केस?

यमराज जी तब
मुँह खोले
और बोले-

हे इंद्रदेव।
'मल्टीप्लैक्स' में
जब भी जाता हूँ,
'भैंसे' की पार्किंग
न होने की वजह से
बिन फिल्म देखे,
ही लौट के आता हूँ।

'बरिस्ता' और 'मैकडोन्लड'
वाले तो देखते ही देखते
इज्जत उतार
देते हैं और
सबके सामने ही
ढ़ाबे में जाकर
खाने-की सलाह
दे देते हैं।

मौत के अपने
काम पर जब
पृथ्वीलोक जाता हूँ
'भैंसे' पर मुझे
देखकर पृथ्वीवासी
भी हँसते हैं
और कार न होने
के ताने कसते हैं।

भैंसे पर बैठे-बैठे
झटके बड़े रहे हैं
वायुमार्ग में भी
अब ट्रैफिक बढ़ रहे हैं।
रफ्तार की इस दुनिया
का मैं भैंसे से
कैसे करूँगा पीछा।
आप कुछ समझ रहे हो
या कुछ और दूँ शिक्षा।

और तो और, देखो
रम्भा के पास है
'टोयटा'
और उर्वशी को है
आपने 'एसेन्ट' दिया,
फिर मेरे साथ
ये अन्याय क्यों किया?

हे इन्द्रदेव।
मेरे इस दु:ख को
समझो और
चार पहिए की
जगह
चार पैरों वाला
दिया है कह
कर अब मुझे न
बहलाओ,
और जल्दी से
'मर्सिडीज़' मुझे
दिलाओ।
वरना मेरा
इस्तीफा
अपने साथ
ही लेकर जाओ।
और मौत का
ये काम
अब किसी और से
करवाओ।
 
 
मोहित गंगवार... 

Saturday, 19 November 2011

क्या आप जानते हैं कि मुहम्मद ने खुद ही इस्लाम की तुलना एक "विषैले नाग" से की है ..??

इसमे कोई दो राय नहीं है और सब जानते हैं कि यह "इस्लामी जहरीला नाग" कितने देशों को डस चुका है , और भारत की तरफ भी अपना "फन फैलाकर फुफकार" रहा है ..लेकिन ये मनहूस सेक्युलर जीव लोग (पिग्विजय और प्रियांजली शर्मा सरीखे लोग ) इतने बेवकूफ हैं कि ये सेक्युलरता के नामपर, और झूठे भाईचारे के बहाने इस "इस्लामी नाग को दूध... पिला रहे हैं" .और तुष्टिकरण की नीतियों को अपना कर आराम से सो रहे है ... जबकि आज जरुरत इस बात की है कि, हम सब मिल कर उस "नाग के फन को कुचल दें" और मुहम्मद की इस ""भविष्यवाणी को सच्चा साबित कर दें"" ,जो उसने इन हदीसों में की थीं ::-

"अबू हुरैरा ने कहा की ,रसूल ने कहा कि,निश्चय ही एक दिन इस्लाम सारे विश्व से निकल कर कर मदीना में में सिमट जायेगा .जैसे एक सांप घूमफिर कर वापिस अपने बिल में घुस जाता है........ 'बुखारी -जिल्द 3 किताब 30 हदीस 100 .

"अब्दुल्ला बिन अम्र बिन यासर ने कहा कि ,रसूल ने कहा कि ,जल्द ही एक ऐसा समय आयेगा कि जब लोग कुरान तो पढेंगे ,लेकिन कुरान उनके गले से नीचे नहीं उतरेगी.और इस्लाम का कहीं कोई निशान नहीं दिखाई देगा "..........बुखारी -जिल्द 9 किताब 84 हदीस 65

"अबू हुरैरा ने कहा कि ,रसूल ने कहा है कि ,इस्लाम सिर्फ दो मस्जिदों (मक्का और मदीना )के बीच इस तरह से रेंगता रहेगा जैसे कोई सांप इधर उधर दो बिलों के बीच में रेंगता है "........................सही मुस्लिम -किताब 1 हदीस 270 .

"इब्ने उमर ने कहा कि ,रसूल ने कहा कि ऐसा निकट भविष्य में होना निश्चय है ,कि इस्लाम और ईमान दुनिया से निकलकर वापस मदीने में इस तरह से घुस जायेगा ,जैसे कोई विषैला सांप मुड़कर अपने ही बिल में घुस जाता है "..................सही मुस्लिम -किताब 1 हदीस 271 और 272 .

अब मैं भी देखता हूँ कि मुसलमान और तथाकथित सेक्युलर इन हदीसों को झूठा कैसे साबित करते है ......?????

जय महाकाल.....!!
 
 मोहित गंगवार...

Thursday, 17 November 2011

रिश्ते

बदल रहे हैं रस्ते सबके
सबकी मंजिल अलग अलग है

कल जहाँ मिले थे,
रुके थे दो पल,
मंजिल के सपने देखे थे,
साथ चले थे चार कदम;
छूट गया है मोड़ वो पीछे,
आगे आगे सब चलते हैं!

आँखें भीगीं, मन कहता है
सपने सच हों सब यारों के
सबको मंजिल हो हासिल
पर,
चार कदम जो साथ चले थे
उन लम्हों का प्यार ना छूटे!
दिल ना टूटें उन लोगों के,
दिल से दिल के तार ना टूटें!

किसे पता, कब चलते चलते रस्ते फिर से मिल जायेंगे!
कौनसी मंजिल की तलाश में, हम तुम फिर से टकरायेंगे!

तब क्या तुम मुझको पहचानोगे?
क्या मैं तुमको पहचानूँगा?

पहचान बने सबकी दुनिया में
पर आपस के पहचान ना छूटे!
दिल से दिल के तार ना टूटें!

 
 मोहित गंगवार...