Friday, 2 March 2012

,ॐ,---- की ब्याख्या अवश्य पढे , कही नही मीलेगा -----------
जिस तरह सात समन्दर, सप्त ऋषी ,रेनबो मे सात रंग , सुर मे सात सुर ,
उसी तरह ,ॐ, मे तिन ध्वनि तरंग होता है ,अ उ म जीसका मान भी 7 होता है ,
जैसे अ का मान 1 , उ का मान 5 , म का मान 37 - 1+ 5 + 3 + 7 =16- 1+6 = , 7 , सात सुर मे भी म बीच मे आता है , इसलिये अपनी जननी को माँ
पूकारते है माँ भी ,ॐ, जैसा हीं 1 शब्द है , 7 लक्की नंबर भी होता है ,
,,ॐ से ही दुनियां सुरू और ॐ से ही दुनियां खत्म होता है,,,,,,
ॐ या अ उ म , ये परब्रम्ह सदाशिव की परब्रम्ह शक्ती या ध्वनि तरंग है ,
इस ॐ ध्वनि तरंग के तीनो , दो या एक शव्द का मिश्रण हर प्राणी , जीव- जन्तु
के आवाज मे निहीत है ,जिसे आप भी सुनकर महसुस कर सकते है ,बच्चो के रोने
मे तीनो ध्वनि ,गाय के आवाज मे तीनो ध्वनि , और बिल्ली की आवाज मे
उल्टा तीनो ध्वनि ,।, कोइ भी बिष्फोट या ब्लाष्ट मे , बिजली की कङक ,
हर प्राणी के आवाज मे तीनो , दो या एक शव्द का उच्चारन आता ही आता है , इन ध्वनियो को किसी का सबूत नही चाहिये ये ध्वनि अपने आप मे अमर ध्वनि है , इन ध्वनियो को हमारे पूर्वजो ने भी पहचाना था इसलिये कुछ जीवो को हमारे लिये , मनहूस करार दिया, आप भी परख सकते है इन ध्वनियो को, ये हर जीव के आवाज मे होता है , चाहे जीव का रोना हो बोलना हो , हुकारना हो रम्हाना हो , दहाङना हो , चित्कारना हो या घुर्राना , किसी जीव के ध्वनि मे धनात्मक ऊर्जा ,
या ऋणात्मक ऊर्जा , होती है , लेकिन ध्वनि ऊर्जा का श्रोत ॐ या अ उ म हीं है ,,,,,,,,,,,हर हर महादेव ,,,,,,,,
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Monday, 20 February 2012

" मेरे प्रभु!
मुझे इतनी ऊँचाई कभी मत देना,
ग़ैरों को गले न लगा सकूँ,
इतनी रु...खाई कभी मत देना। "

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ऊँचे पहाड़ पर,
पेड़ नहीं लगते,
पौधे नहीं उगते,
न घास ही जमती है।

जमती है सिर्फ बर्फ,
जो, कफ़न की तरह सफ़ेद और,
मौत की तरह ठंडी होती है।
खेलती, खिलखिलाती नदी,
जिसका रूप धारण कर,
अपने भाग्य पर बूंद-बूंद रोती है।

ऐसी ऊँचाई,
जिसका परस
पानी को पत्थर कर दे,
ऐसी ऊँचाई
जिसका दरस हीन भाव भर दे,
अभिनंदन की अधिकारी है,
आरोहियों के लिये आमंत्रण है,
उस पर झंडे गाड़े जा सकते हैं,

किन्तु कोई गौरैया,
वहाँ नीड़ नहीं बना सकती,
ना कोई थका-मांदा बटोही,
उसकी छाँव में पलभर पलक ही झपका सकता है।

सच्चाई यह है कि
केवल ऊँचाई ही काफ़ी नहीं होती,
सबसे अलग-थलग,
परिवेश से पृथक,
अपनों से कटा-बँटा,
शून्य में अकेला खड़ा होना,
पहाड़ की महानता नहीं,
मजबूरी है।
ऊँचाई और गहराई में
आकाश-पाताल की दूरी है।

जो जितना ऊँचा,
उतना एकाकी होता है,
हर भार को स्वयं ढोता है,
चेहरे पर मुस्कानें चिपका,
मन ही मन रोता है।

ज़रूरी यह है कि
ऊँचाई के साथ विस्तार भी हो,
जिससे मनुष्य,
ठूँठ सा खड़ा न रहे,
औरों से घुले-मिले,
किसी को साथ ले,
किसी के संग चले।

भीड़ में खो जाना,
यादों में डूब जाना,
स्वयं को भूल जाना,
अस्तित्व को अर्थ,
जीवन को सुगंध देता है।

धरती को बौनों की नहीं,
ऊँचे कद के इंसानों की जरूरत है।
इतने ऊँचे कि आसमान छू लें,
नये नक्षत्रों में प्रतिभा की बीज बो लें,

किन्तु इतने ऊँचे भी नहीं,
कि पाँव तले दूब ही न जमे,
कोई काँटा न चुभे,
कोई कली न खिले।

न वसंत हो, न पतझड़,
हो सिर्फ ऊँचाई का अंधड़,
मात्र अकेलेपन का सन्नाटा।

मेरे प्रभु!
मुझे इतनी ऊँचाई कभी मत देना,
ग़ैरों को गले न लगा सकूँ,
इतनी रुखाई कभी मत देना।
कितनी बार कुछ धरम और संस्कृति आधारित सवालों पर
कूल ड्यूड और लो वेस्ट जींस पहन कर युवा अपना ऐसा बात
कहते हैं जैसे कोई पोप ,परम हंस या कोई इमाम हो ........
मुह से शराब की बॉस आ रही है लेकिन संस्कृति और धरम
को गरियाये जा रहे हैं ........
५ दिन से नहाये नहीं हैं लेकिन पूछते हैं मंदिर जाने से क्या फायदा ......
गर्लफ्रेंड को पिक्चर दिखा के आ रहे हैं कोई साधू
मिला तो कह दिया ......अरे तुम नहीं जानती हो जान ये
ढोंगी है .......
फिल्म के गानों को सुन रहे है, सुनते - सुनते सो गए,सुबह
पैखाने में भी लगा है ईयर फ़ोन ,फिर बस में भी ......और हनुमान चालीसा और वन्देमातरम् के लिए...अरे बचपन में याद था भूल
गयी ....... भाई एक बात बताओ ......५ साल की उम्र से पढ़ रहे
हो .....गणित,विज्ञान ,अंग्रेजी घिस रहे हो .......कोचिंग
में चूस रहे हो .......कालेज में पक रहे हो......फिर भी परीक्षाओं में
नप रहे हो ..........
तो जब आज तक वेद की एक ऋचा नहीं पता ,मानस की चौपाई
नहीं पता ,गीता का श्लोक नहीं पता , ....तो फिर भाई ......क्यों बोलते हो ऐसे की जैसे परमहंस हो .......
यार,आध्यात्म का उदय श्रद्धा और विश्वास से
होता है ...."भवानी शंकरौ बन्दे श्रद्धा विश्वास
रुपिणौ".....और ये ज्ञान से मिलेगा ..........जब शुरू
करोगे ....ज्यादा नहीं ५ मिनट सही ...शुरू तो करो .......
कृपया तार्किक बनें ...स्वागत है लेकिन अपने को सीमाओं में रखते हुए .........हो सकता है की अगले व्यक्ति ने ...जो आप के
सामने खड़ा हो .....साधारण सा .....अपना जीवन
दिया हो उसको समझने में .... साभार---"खून स्याही में उबलने दे

Friday, 17 February 2012

जय जय सियाराम , जय जय श्री राधेकृष्ण , जय जय सनातन संस्कृति , जय जय माँ भारती
अगर हर वस्तु हर कण में भगवा होता तो कैसा होता ?


हर पत्ता हर कण राम राम का गुणगान करता |
जिस तरफ नज़र जाती भगवा ही भगवा नज़र आता ||

हर बृक्ष भगवा होता हर फल भगवा होता |
हर शाख भगवा होती हर फूल भगवा होता ||

हर पर्वत भगवा बन सीना ताने मुस्कुराता |
हर गलीचा जैसे माँ भारती का दामन नज़र आता ||

आकाश में जब पक्षी भगवा रंग में दीखते |
मन प्रफुलित हो श्री राम श्री राम चिल्लाता ||

हर मंदिर पर भगवा ध्वज ध्वज होता |
ना होती कोई मस्जिद ना कोई चर्च नज़र आता ||

साधू संतो की संगत होती सत्संग में रस समता |
श्री राम श्री कृष्ण के जयकारो से पूरा विश्व गूंज जाता ||

जैसे मेरा तन है भगवा मेरा मन है भगवा |
मैं मिलता जब माटी में तो उसका रंग भी होता भगवा ||

_________________________ जीत शर्मा " मानव "

भाई पंकज की प्रेरणा से .........

जय जय सियाराम , जय जय श्री राधेकृष्ण , जय जय सनातन संस्कृति , जय जय माँ भारती

Wednesday, 15 February 2012

♥ एक सुन्दर कविता ♥



ये बात समझ मेँ आयी नहीँ,
और मम्मी ने समझाई नहीँ।

मैँ कैसे मीठी बात करुँ?
जब मीठी चीज कोई खाई नहीँ।

ये चाँद भी कैसा मामू है?
जब मम्मी का वो भाई नहीँ।

क्योँ लम्बे बाल हैँ भालू के?
क्योँ उसने ट्रिमिँग कराई नहीँ?

क्या वो भी गंदा बच्चा है?
या जंगल मेँ कोई नाई नहीँ।

नाना की पत्नी जब नानी है, दादा की पत्नी दादी है,
तब पापा की पत्नी क्योँ पापी नहीँ?

समुन्दर का रंग क्योँ नीला है?
जब नील किसी ने मिलाई नहीँ।

जब स्कूल मेँ इतनी नीँद आती है,
तो क्यूँ बैड वहाँ रखवाई नहीँ?

ये बात समझ मेँ आयी नहीँ,
और मम्मी ने समझाई नहीँ;)

Tuesday, 14 February 2012

एक पिता का ख़त अपने फौजी बेटे के नाम

एक पिता का ख़त अपने फौजी बेटे के नाम
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अक्सर तेरे खतों को सीने से लगा देती है माँ तेरी
तुझे याद करके चुपके से आसू बहा देती है माँ तेरी
तेरे आने का आसरा देकर में अपनी बुढ़ी टांगो को समझाता हूँ
जब दर्द बहुत बढ जाता हैं अपनी टांगो को खुद ही दबा देता हूँ
त्योहारों पर अक्सर तेरी कमी हमेशा मुझे खल ही जाती हैं
सरहद पर जंग छिड़ी है सुनके अक्सर तेरी बहन सहम जाती हैं
खेत खलियानों में अब फसले भी कम ही खिला करती हैं
गावं की सुनी सड़के आज भी तेरा इंतज़ार अक्सर करती हैं
चाहे कुछ भी हो में तुझे कभी वापस गावं ना बुलाउंगा
याद है तूने कहा था इस मिटटी में जनम लिया है मैंने
इस वतन की मिटटी में ही में अपनी जान लुटाऊंगा
.........जय हिंद वन्दे मातरम् जय भारत ..............

-- सुनील "सोनू"
By: Indian Army Fans